भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) द्वारा ब्रेन को-प्रोसेसर पर “मूनशॉट” परियोजना का शुभारंभ

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ

भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) ने ब्रेन को-प्रोसेसर विकसित करने हेतु एक मूनशॉट परियोजना का शुभारंभ किया है। यह परियोजना न्यूरोमॉर्फिक हार्डवेयर और एआई एल्गोरिद्म को संयोजित कर मस्तिष्क की कार्यक्षमता को बढ़ाने या पुनर्स्थापित करने पर केंद्रित है।

ब्रेन को-प्रोसेसर क्या हैं?

  • ब्रेन को-प्रोसेसर उन्नत उपकरण हैं जिन्हें सीधे मानव मस्तिष्क के साथ अंतःक्रिया करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • ये न्यूरल संकेतों को डिकोड करते हैं, उन्हें एआई एल्गोरिद्म द्वारा संसाधित करते हैं और पुनः न्यूरल उत्तेजना या न्यूरोफीडबैक के माध्यम से मस्तिष्क में एन्कोड करते हैं।
  • ये प्रणालियाँ एआई-संचालित क्लोज़्ड-लूप उपकरणों के रूप में कार्य करती हैं, जो संज्ञानात्मक और मोटर कार्यों को पुनर्स्थापित या सुदृढ़ करने में मस्तिष्क की सहायता करती हैं।

परियोजना के प्रमुख उद्देश्य

  • प्रत्यारोपण योग्य और गैर-आक्रामक ब्रेन को-प्रोसेसर विकसित करना, जो मस्तिष्क गतिविधि को डिकोड और संसाधित कर सकें।
  • एआई एल्गोरिद्म और न्यूरोमॉर्फिक हार्डवेयर का उपयोग कर न्यूरल संकेतों की व्याख्या करना तथा तदनुसार मस्तिष्क को उत्तेजित करना।
  • संज्ञानात्मक और मोटर पुनर्वास को सक्षम करना, विशेषकर उन स्ट्रोक पीड़ितों के लिए जिन्होंने वस्तुओं को पकड़ने एवं पहुँचने जैसी संवेदी-मोटर क्षमताएँ खो दी हैं।

ब्रेन को-प्रोसेसर को सक्षम करने वाली मुख्य तकनीकें

  • ब्रेन–मशीन इंटरफ़ेस (BMI): यह मस्तिष्क और बाहरी उपकरणों के बीच संचार मार्ग स्थापित करता है।
    • न्यूरल संकेतों को डिजिटल कमांड में परिवर्तित कर मशीनों द्वारा समझने योग्य बनाता है।
  • न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग: यह हार्डवेयर जैविक न्यूरॉनों की संरचना और कार्यप्रणाली की नकल करता है। इससे ऊर्जा-कुशल संकेत प्रसंस्करण और एआई प्रणालियों व मानव मस्तिष्क के बीच वास्तविक समय अंतःक्रिया संभव होती है।
  • न्यूरल रिकॉर्डिंग तकनीकें:
    • स्टीरियो EEG (sEEG): डीप ब्रेन की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करता है।
    • इलेक्ट्रोकॉर्टिकोग्राफी (ECoG): मस्तिष्क की कॉर्टिकल सतह से सीधे संकेत रिकॉर्ड करता है।
  • क्लोज़्ड-लूप फीडबैक: एआई एल्गोरिद्म न्यूरल संकेतों का विश्लेषण कर मोटर या संज्ञानात्मक कार्यों से संबंधित पैटर्न की पहचान करते हैं।
    • डिकोड किए गए संकेतों को पुनः एन्कोड कर विद्युत उत्तेजना या फीडबैक तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क को भेजा जाता है।
ब्रेन को-प्रोसेसर

पहल का महत्व

  • भारत की न्यूरोसाइंस और न्यूरोटेक्नोलॉजी अनुसंधान क्षमताओं को सुदृढ़ करता है।
  • चिकित्सा प्रौद्योगिकी (इम्प्लांट्स, हार्डवेयर, एआई स्टैक्स) के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देता है।
  • भारत-विशिष्ट न्यूरल डेटासेट और मुक्त स्रोत डिजिटल सार्वजनिक संसाधन तैयार करता है।
  • कम संसाधन वाले स्वास्थ्य तंत्र के लिए सुलभ न्यूरोलॉजिकल उपचारों के विकास में सहायक।

चुनौतियाँ और नैतिक चिंताएँ

  • नैतिकता और गोपनीयता: न्यूरल डेटा अत्यंत संवेदनशील होता है और गोपनीयता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न कर सकता है।
  • नियामक और नैदानिक सत्यापन: चिकित्सा इम्प्लांट्स के लिए कठोर परीक्षण और नियामक अनुमोदन आवश्यक हैं।
  • तकनीकी जटिलता: मानव मस्तिष्क में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं, जिससे सटीक डिकोडिंग अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।
  • लागत और उपलब्धता: उन्नत न्यूरोटेक्नोलॉजी प्रारंभिक चरण में महंगी होती है और केवल विशेषीकृत स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित रहती है।

निष्कर्ष

  • परियोजना की सफलता दीर्घकालिक अनुसंधान वित्तपोषण, नैदानिक परीक्षण, अंतःविषय सहयोग और सुदृढ़ नैतिक शासन ढाँचे पर निर्भर करेगी।
  • यदि सफलतापूर्वक लागू किया गया, तो यह पहल न्यूरोलॉजिकल पुनर्वास को परिवर्तित कर सकती है, लाखों रोगियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला सकती है और भारत को एआई-संचालित ब्रेन–मशीन इंटरफ़ेस प्रौद्योगिकी के अग्रणी देशों में स्थापित कर सकती है।

स्रोत: TH

 

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